चंदन (संथाल एल्बम), एक अत्यधिक मूल्यवान वृक्ष की प्रजाति है, जो सुगंधित लकड़ी, तेल, पारंपरिक कॉस्मेटिक और इत्र उद्योग के लिए अत्यधिक लोकप्रिय है। सैण्डल स्पाइक रोग, जो फायटोप्लाज्मा जनित है, के कारण बड़े पैमाने पर दक्षिण भारत के कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडू प्रदेशों में इसके प्राकृतिक स्त्रोत समाप्त होते जा रहे हैं।चंदन वृक्ष का स्पाइक रोग एक विनाशकारी रोग है, जो चंदन की लकड़ी की गुणवत्ता और सुगंधित तेल की गुणवत्ता को अत्यधिक प्रभावित करता है। यह रोग एक सदी से भी अधिक पुराना है। सर्वप्रथम इस रोग की पहचान कर्नाटक के कूर्ग जिले में वर्ष 1899 में की गई और इसके परिणामस्वरूप एक लाख से अधिक चन्दन वृक्ष वर्ष 1903-1916 के दौरान मैसूर और कूर्ग में नष्ट कर दिये गए। लक्षण स्पाइक रोग के प्रमुख लक्षण पत्ती के आकार में कमी, छोटे इंटरनोड्स और पत्तियों की टहनियों पर झाड़ीनुमा जैसी रचना बन जाती है। रोगी पौधे आमतौर पर 1 से 2 वर्ष के भीतर ही मर जाते हैं। स्पाइक रोग के कारण भारत में केरल और कर्नाटक राज्यों के जंगलों में चंदन वृक्षों की आबादी लगभग समाप्त हो गई है और चंदन का उत्पादन लगभग 20 प्रतिशत की वार्षिक दर से घट रहा है। प्रसार चंदन का स्पाइक रोग ग्राफ्टिंग के माध्यम से प्रसारित होता है। पर्ण फुदका कीट की कुछ प्रजातियां इस रोग को ग्रसित पौधे से स्वस्थ पौधों में फैलाने में सक्षम पाई गई हैं, जिससे इस रोग को कीट संचरण द्वारा व्यापक रूप से फैलने में मदद मिलती है। वास्तविक कीट वेक्टर एवं मेजबान खरपतवार की प्रजातियों की पहचान अभी पूर्ण रूप से संभव नहीं हो सकी है। रोकथाम चंदन स्पाइक रोग के लिए जिम्मेदार फायटोप्लाज्मा को नियंत्रित करने के लिए आर्सेनिक, बेलेट या टेट्रासाइक्लिन का उपयोग करके या गर्म पानी से उपचारित करना प्रभावी है। हालांकि एक बड़े वन क्षेत्र में टेट्रासाइक्लिन या गर्म जल उपचार का उपयोग अव्यवहारिक है। चंदन के ऊतकों से स्पाइक रोग को खत्म करने के लिए सबसे प्रभावी तरीका रोग मुक्त श्रेष्ठ जीनोटाइप का विकास करना होगा। इसके लिए भविष्य में आनुवंशिक परिवर्तन को नियोजित करने के लिए नवीन शोध आवश्यक है। फायटोप्लाज्मा जनित रोग को कीट वेक्टर के उचित प्रबंधन द्वारा भी नियंत्रित किया जाना संभव है। इसके साथ ही साथ वनों व खेतों से संक्रमित चंदन वृक्षों को नष्ट करना एवं खरपतवार के स्पाइक रोग फायटोप्लाज्मा के प्राकृतिक स्रोत हो सकते हैं, उन्हें समय से पहचान कर नष्ट करना भी आवश्यक है। स्त्राेत : गोविन्द प्रताप राव पादप रोगविज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान(खेती पत्रिका), नई दिल्ली-110012